मंगलवार, 11 मई 2010

मेरे खेत का बूढा कुँआ

मेरे खेत का बूढा कुँआ
फूटी किस्मत को रोता है
बरसों तक जिस खेत को सींचा
अब वो हिस्सों में खोता है

अलग अलग नामों पे होंगे
दिल के अलग अलग सब हिस्से
जहाँ कभी बस प्रेम भाव था
देखो बटवारा होता है मेरे खेत ……………

भ्रातॄ प्रेम अब कहाँ वो सारा
कहाँ गया वो भारत बेचारा
नए खेत की नयी मेड़ पर
देखो लक्षमण भी रोता है मेरे खेत ……………

प्रेम की जैसे सूखी नदियाँ
जड़ से उखड रहे सब रिश्ते
अपनों में अपनों को ढूंढता
हर आदमी यहाँ होता है मेरे खेत ……………..

खोये हैं राम सम बेटे
लखन भारत सम भाई खोये
खोयी है जीजा सम माता
लगता है भारत सोता है मेरे खेत …………….

आज लगे यह दिवा स्वप्न सा
किन्तु अटल विश्वास ये मेरा
कल फिर ऐसा कल आएगा
यह परिदृश्य बदल जायेगा
प्रेम अंकुरण हो जायेगा

मेरे खेत से दूर कहीं पर
प्रेम गीत कोई गाता है..........

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