सोमवार, 7 जून 2010

हाईकू


1)

मन उदास
तेरी याद /फिर आई

2)
मेरी हंसी
आती है लौट कर /तेरे आने से

3)
फिर आई
तू /और मेरी हंसी

4)
सूखें है
होठों से हंसी /पोखर धरती पर से

5)
पानी
आँखों में था /नल में नहीं

6)
नर्मदा आई शहर
दुलार करने/गोद में भर

7)
फैसला आया /हादसे का
सज़ा कब ?


8)
सूख चुके आंसू /और पोखर
पानी आया नहीं


9)
बसने लगे /नए गाँव
पुराने मसान पर

10)
विकास हुआ/पेड़ों को काट
रोड़ बने

शनिवार, 15 मई 2010

बहाना

एक कक्षा में एक बच्चा रोज़ देर से आता था , पढने लिखने में कुछ खास नहीं था , जब भी शिक्षक उससे देर से आने का कारण पूछते वो कहता की उसके पिता बीमार हैं और इस लिए उसे घर पर उनके कुछ काम करने पड़ते हैं , रोज़ रोज़ ये ही कारण सुन कर शिक्षक भी समझ गए की बच्चा बहानेबाज़ है , सारे बच्चे उसका मजाक बनाते, फिर एक दिन वो बच्चा समय पर आने लगा , कुछ दिन तक उसकी इस आदत को देख एक दिन शिक्षक ने उससे पूछा की क्या अब उसके पिता उसे काम नहीं बताते इस पर उस बच्चे ने कहा नहीं, शिक्षक ने फिर पूछा क्यों क्या उन्होंने कोई नौकर रख लिया है इस पर सारी कक्षा के बच्चे हस पड़े, उस लड़के ने कहा नहीं क्योंकि पिता का देहांत हो गया है , इस पर शिक्षक सहित पूरी कक्षा सन्न रह गयी.

गुरुवार, 13 मई 2010

निमाड़ी क्षणिकाएं

निमाड़ी क्षणिकाएं
जो वस्तुतः मनी मोहन सिंह जी की सरकार के विश्वासमत के समय अचानक सूझी थीं

म्हारा गाँव म SS नी छे रोड
न उनख ss बटी गया कई करोड़
गिणी गिणी न मरी जओगा
म्हख S कओज की पत्थर तोड़

दो सौ बहोत्तर को चक्कर थो
राजा बणी गयो जो फक्कड़ थो
लोकतंत्र की चिता जल-S-ई न
भुट्टो सेक्यो अक्कल को

बुधवार, 12 मई 2010

माँ है

माँ है तो लोरी है
कहानी है
माँ है तो बचपन की हर याद
सुहानी है.

माँ है तो निष्कपट प्रेम
की धार है
माँ है तो शक्ति है
आधार है .

माँ है तो दूध है
दूध का कर्ज है
माँ है बे असर
हर मर्ज है.

माँ है तो वात्सल्य है
ममता है
माँ है तो शीश कहीं और
कहाँ नमता है?

माँ है तो करुणा है
क्षमा है
माँ है तो
रोना मना है.

मैं मुस्काता ही जाऊं

कार्तिकेय ये कविता तुम्हे समर्पित है , ये कविता मैंने करीब एक साल पहले लिखी थी और लिख कर भूल गया , आज जब इसे पढ़ा तो लगा जैसे ये तुम्हीं को ध्यान में रख कर लिखी हो.


जब जब आये रुदन मुझे
तब मेघराज तुम आ जाना
ले कर के घनघोर घटा फिर
बरस बरस बरसा जाना

तेरे उस जल के भीतर ही
अश्रु मेरे भो छुप जाएँ
जल में जल मिल जाए
और ये विश्व मुझे हँसता पाए

क्वचित मात्र भी भान न हो
मेरे दुःख का इन लोगों को
बस मुस्काता ही भोगूँ मैं
इस जीवन के भोगों को

त्रास बड़े हों या की छोटे
मैं मुस्काता ही जाऊं
सुख या दुःख तेरे प्रसाद हैं
ले आनंद उन्हें पाऊं

है जीवन ये बड़ा आनंदी
ये सन्देश मुझे तो है
इसको मैं सब तक पहुंचाऊं
इतनी शक्ति मुझे दे दे .

बात करते हो

किस ज़माने की बात करते हो
आजमाने की बात करते हो

दर्द की हद से हम गुज़र भी चुके
तिलमिलाने की बात करते हो

रो चुके हाल-ऐ-दिल सर-ऐ-बाज़ार
तुम जताने की बात करते हो

इस चमन में युगों से सूखा है
ग़ुल खिलाने की बात करते हो

मैं नहीं हूँ किसी से रूठा हुआ
क्यों मानाने की बात करते हो

है अँधेरा बहुत सियाह यहाँ
घर जलाने की बात करते हो

आ भी जाते हो चुप से ख्वाबों में
और न आने की बात करते हो

है उदासी अब तो मेरा सबब
मुस्कुराने की बात करते हो

खुद गरेबाँ में झांक कर देखो
क्यों ज़माने की बात करते हो

मंगलवार, 11 मई 2010

इक दिन क्यों ?

शिक्षक दिन
फिर आया
और लाया
औपचारिकताओं का एक समारोह अपने साथ
फिर भाषण फिर कविता
गुलदस्ते और धन्यवाद
फिर बातें पिछली सी
चिकनी सी चुपडी सी
फिर मंडन महिमा का
शिक्षक की गरिमा का ..
और कहते .....
हे गुरूजी ......
अज्ञ को विज्ञ कर आपने हित किया
धन्य हैं धन्य हैं ज्ञान दें नित नया
आप तो महान हैं विद्या के प्राण हैं
प्रथम पूज्य शिक्षकगण स्वीकारें अभिनन्दन
मेरा मन ...
मेरा मन ,
मेरा मन पूछे नित एक प्रश्न
इक दिन क्यों ?
इक दिन क्यों भाषण क्यों गुलदस्ते गायन क्यों
महिमा का मंडन क्यों अंतर से खंडन क्यों
एक प्रश्न इक दिन क्यों
शिक्षक की याद आज इक दिन क्यों
आओ हम मिल कर के सोचें बस इक दिन क्यों
सकल वर्ष शिक्षक को दें आदर अन्तर से करें नमन
फिर बनायें शिक्षक दिन वर्ष के हर इक दिन को

इक दिन क्यों .......