बोलता है तो बुरा लगता है
मुझको वो मेरी तरह लगता है
कैसी चुप्पी है जबाँ पे उनकी
मामला आज टला लगता है
मुस्कुरा देता है जब देख अपनी बेटी को
तब वो इंसान भला लगता है
खूबसूरत , गुल ए गुलजार , या के जान मेरी
एक चेहरा है जो मुझको बला लगता है
ना समझते हैं वो आँख के इशारों को
हमको उनका ये मरासिम तो नया लगता है
यूँ नहीं आती हैं ये लाल लकीरें अक्सर
आज आँखों में मुझे तेरी धुंआ लगता है
बुधवार, 9 मार्च 2011
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
मैं खोजता............ खुद ही को
कल फिर रहा मैं खोजता अपने वजूद को
कल फिर मेरी तलाश में भटका मैं दर ब दर
पूछा था उसने प्यार से क्या चाहिए हुज़ूर
इसका जवाब सोचता बैठा मैं कुछ पहर
कल फिर मेरी तलाश में भटका मैं दर ब दर
पूछा था उसने प्यार से क्या चाहिए हुज़ूर
इसका जवाब सोचता बैठा मैं कुछ पहर
शनिवार, 12 फ़रवरी 2011
हवा हूँ मैं
आग हूँ, मिट्टी हूँ, पानी हूँ, हवा हूँ मैं
मैंने कब किस से कहा है , के खुदा हूँ मैं ?
ज़र्द चेहरों में चमकता हुआ है रूख़ मेरा
मरा हुआ हूँ मैं भी मगर जुदा हूँ मैं
नहीं मुझे नहीं मंजूर हैं ये तेरे हिसाब
ये अब चाहे तो तू कह ले के सिरफ़िरा हूँ मैं
ये सारे रेंगते हैं कोहनियों पे घुटनों पे
अभी भी पैरों पे अपने मगर खड़ा हूँ मैं.
मैंने कब किस से कहा है , के खुदा हूँ मैं ?
ज़र्द चेहरों में चमकता हुआ है रूख़ मेरा
मरा हुआ हूँ मैं भी मगर जुदा हूँ मैं
नहीं मुझे नहीं मंजूर हैं ये तेरे हिसाब
ये अब चाहे तो तू कह ले के सिरफ़िरा हूँ मैं
ये सारे रेंगते हैं कोहनियों पे घुटनों पे
अभी भी पैरों पे अपने मगर खड़ा हूँ मैं.
शुक्रवार, 28 जनवरी 2011
वो चुप है,कोई राज़ है इसमें गहरा
वर्ना अब तक चाल चल गया होता
कैसे कैसे खरीदने वाले
और होता ,फिसल गया होता
ये मेरे हौसलों की गर्मी है
वर्ना सूरज तो ढल गया होता
बंद हैं मैकदे और मय खारी
वरना गिर के संभल गया होता
ये तेरा इश्क है के ज़िंदा हूँ
वरना ये दम निकल गया होता
गर मरासिम की समझता कीमत
यूं न आँखों में खल गया होता
पाल रख्खी हैं बुरी आदतें खुद में वरना
मुझसे अल्लाह जल गया होता .
वर्ना अब तक चाल चल गया होता
कैसे कैसे खरीदने वाले
और होता ,फिसल गया होता
ये मेरे हौसलों की गर्मी है
वर्ना सूरज तो ढल गया होता
बंद हैं मैकदे और मय खारी
वरना गिर के संभल गया होता
ये तेरा इश्क है के ज़िंदा हूँ
वरना ये दम निकल गया होता
गर मरासिम की समझता कीमत
यूं न आँखों में खल गया होता
पाल रख्खी हैं बुरी आदतें खुद में वरना
मुझसे अल्लाह जल गया होता .
लेबल:
आदतें,
खरीदने,
खुद,
राज़,
सूरज;अंतर्मन
समंदर नए हैं
नयी हवाएं हैं , बवंडर नए हैं
सिर्फ तूफ़ान नहीं , समंदर नए हैं
ये पहले तीन थे , अब बढ़ गयी है इनकी आबादी
नए गाँधी हैं और बन्दर नए नए हैं
अलग ही तौर हैं पूजा के इनकी
नए भगवान् हैं , मंदर नए हैं
जो घर से निकलो , संभल कर निकलो
हर एक मोड़ पे मंजर नए हैं
के निकले हारने दुनिया को अपनी
हम नयी नस्ल के सिकंदर नए हैं
लिख्खा करते हैं बस यूं ही , इसे संजीदा न समझो
अरे बस जान लो कोठारीजी शायर नए हैं.
सिर्फ तूफ़ान नहीं , समंदर नए हैं
ये पहले तीन थे , अब बढ़ गयी है इनकी आबादी
नए गाँधी हैं और बन्दर नए नए हैं
अलग ही तौर हैं पूजा के इनकी
नए भगवान् हैं , मंदर नए हैं
जो घर से निकलो , संभल कर निकलो
हर एक मोड़ पे मंजर नए हैं
के निकले हारने दुनिया को अपनी
हम नयी नस्ल के सिकंदर नए हैं
लिख्खा करते हैं बस यूं ही , इसे संजीदा न समझो
अरे बस जान लो कोठारीजी शायर नए हैं.
सोमवार, 22 नवंबर 2010
ग़ज़ल
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
नरक चौदस और माँ.
हालाँकि ये पोस्ट पुरानी है और मैं इसे पहले भेज चुका हूँ लेकिन आज बड़ी प्रासंगिक लगी इसलिए फिर से पोस्ट कर रहा हूँ. ...
"नरक चौदस के दिन
स्नान
सूर्योदय से पहले हो
वरना
नरक लगता है"
ऐसा बतलाती है माँ
और इसीलिए खुद जल्दी उठ
हमें उठा
हल्दी उबटन लगा
और नहलाती है माँ
हमारे बाद बारी होती है
घर के आँगन के बुहारे झाड़े जाने की
क्यों कि गन्दा घर नरक-सम होता है
बरसों से समझाती है माँ
क्रमशः हमें, पिता को, घर को, आँगन को,
नरक से मुक्त कराने के प्रयास के चलते
उग आता है सूर्य
और सूर्य के आँगन की दीवार पर चढ़ जाने तक
बिना नहाये रह जाती है माँ.
यही सिलसिला जारी है
बरसों से बदस्तूर .........
"नरक चौदस के दिन
स्नान
सूर्योदय से पहले हो
वरना
नरक लगता है"
ऐसा बतलाती है माँ
और इसीलिए खुद जल्दी उठ
हमें उठा
हल्दी उबटन लगा
और नहलाती है माँ
हमारे बाद बारी होती है
घर के आँगन के बुहारे झाड़े जाने की
क्यों कि गन्दा घर नरक-सम होता है
बरसों से समझाती है माँ
क्रमशः हमें, पिता को, घर को, आँगन को,
नरक से मुक्त कराने के प्रयास के चलते
उग आता है सूर्य
और सूर्य के आँगन की दीवार पर चढ़ जाने तक
बिना नहाये रह जाती है माँ.
यही सिलसिला जारी है
बरसों से बदस्तूर .........
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